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उद॑ग्ने भारत द्यु॒मदज॑स्रेण॒ दवि॑द्युतत्। शोचा॒ वि भा॑ह्यजर ॥४५॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ud agne bhārata dyumad ajasreṇa davidyutat | śocā vi bhāhy ajara ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उत्। अ॒ग्ने॒। भा॒र॒त॒। द्यु॒ऽमत्। अज॑स्रेण। दवि॑द्युतत्। शोच॑। वि। भा॒हि॒। अ॒ज॒र॒ ॥४५॥

ऋग्वेद » मण्डल:6» सूक्त:16» मन्त्र:45 | अष्टक:4» अध्याय:5» वर्ग:29» मन्त्र:5 | मण्डल:6» अनुवाक:2» मन्त्र:45


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स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे (भारत) धारण करनेवाले (अजर) जरा दोष से रहित (अग्ने) विद्वन् ! आप (अजस्रेण) निरन्तर (द्युमत्) प्रकाशवाले को (दविद्युतत्) प्रकाशित करते हो, उसके लिये आप (उत्, शोचा) अत्यन्त प्रकाशित हूजिये और (वि, भाहि) विशेष करके प्रकाशित करिये ॥४५॥
भावार्थभाषाः - जैसे ब्रह्माण्ड में सूर्य्य निरन्तर प्रकाशित होता है, वैसे ही विद्वान् जन सत्य व्यवहार में प्रकाशित हों ॥४५॥
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स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनर्मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥

अन्वय:

हे भारताजराग्ने ! भवानजस्रेण द्युमद्दविद्युतत् तदर्थं त्वमुच्छोचा वि भाहि ॥४५॥

पदार्थान्वयभाषाः - (उत्) (अग्ने) विद्वन् (भारत) धर्त्तः (द्युमत्) प्रकाशवत् (अजस्रेण) निरन्तरेण (दविद्युतत्) द्योतयति (शोचा) अत्र द्व्यचोऽतस्तिङ इति दीर्घः। (वि) (भाहि) (अजर) जरादोषरहित ॥४५॥
भावार्थभाषाः - यथा ब्रह्माण्डे सूर्य्यः सततं प्रकाशते तथैव विद्वांसः सत्यव्यवहारे प्रकाशयन्ताम् ॥४५॥
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माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जसा ब्रह्मांडात सूर्य सतत प्रकाश देतो तसाच विद्वान लोकांनी सत्य व्यवहार करावा. ॥ ४५ ॥